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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी अपराध को केवल तभी आतंकवादी कृत्य नहीं कहा जा सकता जब आरोपी को आतंकवाद विरोधी कानून के तहत दोषी ठहराया गया हो। कोर्ट ने कहा कि सेना के मुखबिर की हत्या करके लोगों को कानून का पक्ष लेने से रोकने के लिए भय का माहौल पैदा करना भी आतंकवादी कृत्य है, भले ही इस मामले में आतंकवाद विरोधी कानून लागू न किया गया हो।
जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस एसवीएन भट्टी की बेंच इस बात से सहमत नहीं थी कि जम्मू-कश्मीर में सेना के मुखबिर समेत तीन नागरिकों की एके-47 से हत्या आतंकवादी कृत्य नहीं थी, क्योंकि इसमें आतंकवाद विरोधी कानून के तहत दोषसिद्धि नहीं हुआ। बेंच ने इस मामले में 27 साल जेल में बिता चुके एक दोषी गुलाम मोहम्मद भट की सजा माफी याचिका पर विचार करते हुए अपनी आपत्ति व्यक्त की।
यह अराजकता फैलाने के लिए किया गया था ताकि कोई भी कानून का पक्ष लेने की हिम्मत न कर सके, तो यह निश्चित रूप से एक आतंकवादी कृत्य के लक्षण रखता है और इस नीति के तहत छूट नहीं दी जा सकती। आपको छूट नीति को चुनौती देनी होगी।
कैदी गुलाम भट ने दलील दी कि उसे आतंकवाद-रोधी कानून के तहत नहीं, बल्कि केवल हत्या के आरोप में दोषी ठहराया गया था। इसलिए उसके कृत्य को आतंकवादी कृत्य नहीं कहा जा सकता। जम्मू-कश्मीर सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि आतंकवादी कृत्य के लिए आजीवन कारावास की सजा काट रहा कोई भी अपराधी राज्य की नीति के तहत छूट का हकदार नहीं है। कैदी गुलाम की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट ने कहा कि भट को केवल हत्या और शस्त्र अधिनियम के तहत दोषी ठहराया गया था, न कि तत्कालीन आतंकवाद-रोधी कानून टाडा के तहत।
उन्होंने कहा कि कोर्ट में ऐसा कुछ भी साबित नहीं हुआ जिससे टाडा के प्रावधान लागू हों। निचली अदालत या हाई कोर्ट ने इसे कभी आतंकवादी कृत्य नहीं माना। जम्मू-कश्मीर सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि घटनास्थल से ग्रेनेड दागने वाले हथियार समेत विस्फोटक उपकरण भी बरामद किए गए हैं। यह एक आतंकी कृत्य है, यह कोई साधारण हत्या नहीं है। बेंच ने कहा कि यदि आप लोगों में भय पैदा करना चाहते हैं ताकि कोई भी इस अवैध कृत्य के खिलाफ अधिकारियों के पास न जाए, तो यह एक आतंकवादी कृत्य है और हम अपनी आँखें बंद नहीं कर सकते।
सुप्रीम कोर्ट ने वकील की उस याचिका को स्वीकार कर लिया जिसमें उन्होंने चल रही कार्यवाही के दौरान जम्मू-कश्मीर छूट नीति को चुनौती देने की अनुमति मांगी थी।

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