सरकारी या सार्वजनिक संपत्ति पर प्रतिकूल कब्ज़े का दावा बहुत कठोर मानदंडों पर परखा जाना चाहिए

सरकारी भूमि पर प्रतिकूल कब्ज़े का दावा खारिज
दमोह। सिविल न्यायाधीश अनुप्रेक्षा जैन की अदालत ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए सरकारी भूमि पर प्रतिकूल कब्ज़े के आधार पर स्वामित्व का दावा करने वाली वादिनी श्यामबाई शर्मा का प्रकरण खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल लंबे समय तक कब्ज़ा बनाए रखना किसी व्यक्ति को सरकारी भूमि का मालिक नहीं बनाता। म.प्र. शासन की ओर से प्रकरण की पैरवी शासकीय अभिभाषक राजीव बद्री सिंह द्वारा की गई। मामले का विवरण वादिनी द्वारा यह दावा किया गया था कि वह धरमपुरा मोजे, फुटेरा तालाब के पास स्थित लगभग एक हेक्टेयर भूमि पर पिछले 40 वर्षों से कृषि कार्य कर रही है। उसने कई बार शासन से कृषि पट्टा मांगने की बात भी कही, परंतु पट्टा स्वीकृत नहीं हुआ। वादिनी ने यह भी आरोप लगाया कि कुछ लोग उसकी जमीन पर कब्ज़ा करने की कोशिश कर रहे हैं, इसलिए उसे भूमि स्वामी घोषित किया जाए। वादी पक्ष ने अपने कब्ज़े के समर्थन में कई गवाह प्रस्तुत किए। वहीं शासन पक्ष के अधिवक्ता राजीव बद्री सिंह ने तहसीलदार रोबिन जैन के साक्ष्य सहित दस्तावेजों के आधार पर यह सिद्ध किया कि वादिनी का कब्ज़ा न तो निरंतर था और न ही शांतिपूर्ण। बल्कि, कई बार उसका अवैध कब्ज़ा हटाया गया है। यह भी बताया गया कि भूमि के वर्तमान मूल्य में बढ़ोतरी होने के कारण झूठे आधार पर दावे किए गए हैं। अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि— सरकारी या सार्वजनिक संपत्ति पर प्रतिकूल कब्ज़े का दावा बहुत कठोर मानदंडों पर परखा जाना चाहिए। कब्ज़ा खुला, शांतिपूर्ण, निरंतर और वास्तविक स्वामी को चुनौती देने वाला होना जरूरी है। कब्ज़े के साक्ष्य मजबूत, दस्तावेजी और लंबे समय तक निर्विवाद होने चाहिए। अदालत ने पाया कि वादिनी अपने कथित 40–50 वर्ष पुराने कब्ज़े का कोई विश्वसनीय दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सकी। राजस्व अभिलेखों में भी लंबे समय तक उसका नाम दर्ज नहीं पाया गया, जो प्रतिकूल कब्ज़े के दावे के विरुद्ध महत्वपूर्ण तथ्य है। अंततः न्यायालय ने वादिनी का प्रकरण अस्वीकार करते हुए कहा कि सरकारी भूमि पर प्रतिकूल कब्ज़े के आधार पर स्वामित्व का दावा सिद्ध नहीं होता।
