एसआईटी की जांच जारी, ठोस कार्रवाई को लेकर सवाल अब भी बरकरार

बालाघाट। जिले के बहुचर्चित सरकारी चावल घोटाले में एसआईटी की जांच जितनी आगे बढ़ रही है, उतने ही सवाल भी खड़े हो रहे हैं। एक ओर अदालत ने एवीजे एथेनॉल प्लांट के निदेशकों की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर सख्त रुख दिखाया है, वहीं दूसरी ओर प्रभावशाली लोगों पर कार्रवाई न होने से पूरी जांच की निष्पक्षता पर सवालिया निशान लगने लगे हैं।
सरकारी चावल की हेराफेरी के मामले में एवीजे एथेनॉल प्लांट बोरगांव (छिंदवाड़ा) के निदेशक/मालिक अभिनव सिंघल और अरुण सिंघल की अग्रिम जमानत याचिका को प्रथम अपर सत्र न्यायाधीश वारासिवनी के न्यायालय ने खारिज कर दिया है। कोर्ट के इस फैसले के बाद प्रकरण में नामजद सभी आरोपी अब जमानत या अग्रिम जमानत के लिए न्यायालय की शरण में पहुंच चुके हैं। इस प्रकरण में अब तक उबेद खान, राकेश श्रीवास्तव, सौरभ संचेती, अतुल बिसेन, राजीव कुमार भंडारी, किशनलाल खंडेलवाल सहित अन्य की जमानत, अग्रिम जमानत याचिका लोअर कोर्ट से खारिज हो चुकी है। चावल घोटाले में कोर्ट के सख्त रुख के बावजूद यदि जांच एजेंसियां बड़े नामों तक नहीं पहुंच पातीं, तो यह न केवल जांच की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करेगा, बल्कि पूरे सिस्टम पर भी गहरे सवाल छोड़ जाएगा।
इधर, मामले की जांच कर रही एसआईटी ने अब तक 17 लोगों को आरोपी बनाया है और चावल की अफरा-तफरी में उपयोग किए गए 26 ट्रकों को जब्त किया है। जांच एजेंसी ने दो सैकड़ा से अधिक लोगों से पूछताछ भी की है। बावजूद इसके, अब तक की कार्रवाई को लेकर आमजन और राजनीतिक गलियारों में असंतोष साफ दिखाई देने लगा है।
जांच जारी, कार्रवाई लाचार—बड़े चेहरों पर क्यों मेहरबानी?
इस हाईप्रोफाइल घोटाले में एक ऐसी राइस मिल का नाम सामने आया है, जिसके तार कथित रूप से राजनीतिक, प्रभावशाली और रसूखदार लोगों से जुड़े बताए जा रहे हैं। अपेक्षा थी कि इस मिल से जुड़े सभी साझेदारों पर सख्त कार्रवाई होगी, लेकिन अब तक ऐसा नहीं हो सका है। सूत्रों के अनुसार पुलिस को इस मिल के एक बड़े साझेदार के खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं मिले हैं, जिसके चलते उस पर कार्रवाई नहीं की गई है। यही वजह है कि एसआईटी की जांच पर अब सवाल उठने लगे हैं—क्या जांच केवल छोटे खिलाडयि़ों तक सीमित रह जाएगी या फिर बड़े नामों तक भी पहुंचेगी? इस पूरे मामले में अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या एसआईटी प्रभावशाली लोगों पर भी वैसी ही सख्ती दिखाएगी, जैसी अन्य आरोपियों पर दिखाई गई है, या फिर जांच की दिशा कहीं और मोड़ दी जाएगी।
मिलिंग ठप, घोटाला गरम—जिम्मेदार कौन?
घोटाले की आंच अब कस्टम मिलिंग व्यवस्था पर भी साफ दिखाई देने लगी है। जिले के विभिन्न कैप और गोदामों में वर्तमान में 29.70 लाख क्विंटल धान कस्टम मिलिंग के लिए भंडारित है, लेकिन राइस मिलर्स मिलिंग में कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं। हालात यह हैं कि कभी मिलिंग के लिए लॉट लेने को लेकर नागरिक आपूर्ति निगम में भीड़ लगाने वाले मिलर्स अब दूरी बना रहे हैं, और विभागीय अधिकारियों को उन्हें मनाने की स्थिति बन गई है। हाल ही में एफसीआई भोपाल के अधिकारियों ने बालाघाट पहुंचकर धान भंडारण की समीक्षा की और मिलिंग की समयसीमा बढ़ाने पर चर्चा की।
113 मिलर्स ने किया अनुबंध, फिर भी काम अटका
वर्ष 2025-26 में समर्थन मूल्य पर खरीदी गई धान की कस्टम मिलिंग के लिए जिले के 113 मिलर्स ने अनुबंध किया है, जबकि पिछले वर्ष यह संख्या 126 थी। इन मिलर्स को कुल 56 लाख क्विंटल धान मिलिंग के लिए दिया जाना है। पहले चरण में 27 लाख क्विंटल धान मिलर्स को दिया गया, जिसके बदले 18 लाख क्विंटल चावल शासन को प्राप्त हो चुका है। फरवरी से मई तक मिलिंग सुचारू रूप से चली और पहले चरण का लगभग 90 प्रतिशत कार्य पूरा भी हो गया, लेकिन दूसरे चरण में 1242 करोड़ रुपए मूल्य की 29.70 लाख क्विंटल धान की मिलिंग पूरी तरह अटक गई है।
यदि निर्धारित समय पर मिलिंग पूरी नहीं होती है, तो शासन को भंडारण, रखरखाव और धान को अन्य जिलों में भेजने के लिए अतिरिक्त परिवहन खर्च का भारी बोझ उठाना पड़ सकता है। एक तरफ चावल घोटाले में एसआईटी की कार्रवाई पर सवाल हैं, दूसरी तरफ मिलर्स की बेरुखी से मिलिंग व्यवस्था चरमराने लगी है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या सिस्टम इस दोहरे संकट से उबर पाएगा या फिर सरकारी धान और जनहित दोनों ही दांव पर लगते रहेंगे?
